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कल्याण मटका कैसे शुरू हुआ

4 min read Updated 2 Sep 2026
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  1. 1. शुरुआत — कपास के भाव से
  2. 2. "मटका" नाम कैसे पड़ा
  3. 3. कल्याण मटका की शुरुआत — 1962
  4. 4. रतन खत्री का दौर — 1964
  5. 5. स्वर्णकाल — 1970 से 1990
  6. 6. गिरावट — 1990 का दशक
  7. 7. खेल कैसे चलता था
  8. 8. आज की स्थिति
  9. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कल्याण मटका का नाम आज भी सबसे ज़्यादा लिया जाता है, लेकिन यह शुरू कैसे हुआ और नाम "मटका" क्यों पड़ा — यह कहानी कम ही जगह पूरी तरह लिखी मिलती है। नीचे पूरा सफ़र क्रम से दिया गया है।

1. शुरुआत — कपास के भाव से

समय: 1950–1960 का दशक। जगह: मुंबई।

शुरुआत में यह नंबरों का खेल था ही नहीं। लोग Bombay Cotton Exchange पर आने वाले कपास के भाव पर शुमार लगाते थे। ये भाव New York Cotton Exchange से टेलीप्रिंटर के ज़रिए मुंबई आते थे, और उन्हीं आँकड़ों के आधार पर हार-जीत तय होती थी।

2. "मटका" नाम कैसे पड़ा

1961 में न्यूयॉर्क कॉटन एक्सचेंज से भाव आना बंद हो गया। इसके बाद आयोजकों को कोई नया तरीक़ा चाहिए था।

उन्होंने 0 से 9 तक के नंबर पर्चियों पर लिखकर एक मिट्टी के घड़े — यानी मटके — में डालने शुरू किए। घड़े से जो पर्ची निकलती, वही विजेता नंबर माना जाता था। इसी वजह से इसका नाम मटका पड़ गया, और आज तक वही चल रहा है — भले ही अब कोई घड़ा इस्तेमाल नहीं होता।

3. कल्याण मटका की शुरुआत — 1962

1962 में कल्याणजी भगत ने वर्ली इलाक़े से अपना मटका शुरू किया। इसकी सबसे बड़ी बात यह थी कि यह रोज़ चलता था — हफ़्ते में एक-दो दिन नहीं।

यही वजह थी कि यह मुंबई की कपड़ा मिलों के मज़दूरों और आम लोगों के बीच बहुत तेज़ी से फैला। रोज़ का सिलसिला होने से यह लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बन गया, और नाम "कल्याण" वहीं से चल पड़ा।

4. रतन खत्री का दौर — 1964

1964 में रतन खत्री ने अपनी अलग मटका लाइन शुरू की। उन्होंने नियमों में कई बदलाव किए और इसे एक व्यवस्थित ढाँचा दिया। उन्हें अक्सर "मटका किंग" कहा जाता रहा।

इसी दौर में वे प्रारूप बने जो आज भी चलते हैं — ओपन, क्लोज़, जोड़ी और पन्ना। यानी आज जो हिसाब आप चार्ट में देखते हैं, उसकी नींव इसी समय पड़ी।

5. स्वर्णकाल — 1970 से 1990

1970 से 1990 के बीच यह अपने चरम पर था:

  • मुंबई की कपड़ा मिलों के हज़ारों मज़दूर इससे जुड़े हुए थे।
  • नेटवर्क कई राज्यों तक फैल गया।
  • अलग-अलग शहरों में अपनी-अपनी मार्केट शुरू हो गईं — यही आगे चलकर आज की कई मार्केटों का आधार बनीं।

इसी दौर में "मार्केट" का ढाँचा बना — हर लाइन का अपना तय समय, अपना अलग रिकॉर्ड।

6. गिरावट — 1990 का दशक

1990 के दशक में पुलिस की सख़्त कार्रवाई और जुआ-विरोधी क़ानूनों के कारण कई अड्डे बंद हो गए। कपड़ा मिलों का बंद होना भी एक बड़ी वजह रही — जो सबसे बड़ा जुड़ा हुआ तबका था, वही बिखर गया।

इसके बाद कुछ गतिविधियाँ भूमिगत हो गईं, और आगे चलकर इंटरनेट के ज़रिए जानकारी और रिज़ल्ट फैलने लगे।

7. खेल कैसे चलता था

  1. खिलाड़ी एक या अधिक नंबर चुनते थे।
  2. पर्चियाँ मटके में डाली जाती थीं।
  3. निकले हुए नंबर के आधार पर नतीजा तय होता था।
  4. समय के साथ "ओपन", "क्लोज़", "जोड़ी" और "पन्ना" जैसे प्रारूप विकसित हुए।

आज भी बुनियादी ढाँचा वही है — बस घड़े की जगह मार्केट का घोषित रिज़ल्ट आ गया है। आज का हिसाब कैसे चलता है, यह ओपन-क्लोज़ और जोड़ी वाले पेज पर विस्तार से दिया गया है।

8. आज की स्थिति

आज मुख्य रूप से रिज़ल्ट और चार्ट ऑनलाइन देखे जाते हैं। कल्याण बाज़ार पर आप कल्याण जोड़ी चार्ट, पैनल चार्ट और बाक़ी सभी मार्केटों का रिकॉर्ड All Charts पेज पर देख सकते हैं।

क़ानूनी स्थिति को लेकर काफ़ी भ्रम रहता है — भारत में पैसे लगाकर खेलना ज़्यादातर राज्यों में क़ानूनी नहीं है, और हर राज्य का अपना अलग क़ानून है। पूरा ब्योरा इस पेज पर दिया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मटका नाम कहाँ से आया?

मिट्टी के घड़े (मटके) से, जिसमें नंबर लिखी पर्चियाँ डाली जाती थीं और उसी से निकाली जाती थीं।

कल्याण मटका कब शुरू हुआ?

1962 में, कल्याणजी भगत द्वारा वर्ली, मुंबई से।

क्या आज भी घड़े से नंबर निकाले जाते हैं?

नहीं। वह तरीक़ा दशकों पहले ख़त्म हो चुका है — नाम भर रह गया है।

यह पेज किस लिए है?

सिर्फ़ ऐतिहासिक जानकारी के लिए। यह किसी को खेलने की सलाह नहीं देता।

यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से है और 18 वर्ष से कम आयु के लोगों के लिए नहीं है।

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